पथरीली घास-भरी इस पहाड़ी की ढाल पर
1942
पथरीली घास-भरी इस पहाड़ी के ढाल पर, टॉप्सी और मैं।
बगल में सचेत बैठी स्पैनियल की तेज-तेज साँस।
एक अनमना-सा आधा स्केच;
धूप में चमकती, मेरी गोद में एक सफ़ेद कॉपी खुली।
हिलते-चमकते बहुत-हरे छोटे-बड़े पेड़ मेरे चारों ओर खड़े।
धूप से उज्ज्वल-नीले आकाश में, धुले आकाश में उज्ज्वल,
वर्षा के बादल।
मानो रुई की बिखरी बिखरी छोटी-बड़ी पूनियाँ।
कभी-कभी धीमी धीमी साफ़ मधुर हवा की गूंज-
ढाक के वन के ढाल के हलके, धीमे चड़मड़ चड़मड़-मर्मर के पीछे का
बैकग्राउंड एक स्टेशन।
इंजन की ज्झाँयें-ज्झाँयँ ! ग्घर्रर ! ग्घर्रर लम्बी स्स्सीई
- नहीं तो यहाँ केवल हवा के मधुर हलके स्वर ही थे।
कोमल-मोटी-एक-दो बार पतली-सीटी। शंटिंग
इंजन—
हवाओं की मिली-जुली कानाफूसियाँ। सजग टॉप्सी।
नीचे वह दूर एक बड़ा, धूमिल हरा झिलमिल उद्यान-सा,
और अनगिनती छतों से कहीं-कहीं चमकता हुआ,
शहर जबलपुर।
उसके हरियाले लांज, बीच-बीच में हरियाले कंपाउंड्स।
और नीचे हमारे पास ही खुदाई के लाल-काले कँकरीले ढेर।
...एक शोर-सा-वह कौन चिड़िया बोली ?
फिर ? फिर ?
पास का वह काँच घर। कहीं बच्चों का भी कुछ द्वंद्व-सा।
सर पर लाल मिट्टी के बोझ उठाये हुए मजूरनियों की टोलियाँ।
किसी स्टीम देते हुए इंजन की एक धीरे-धीरे पास आती
साँस-
तेज; फिर एकाएक बन्द : मगर नहीं -
अचानक एक लम्बी सीटी।
धूप का तेज़ तिरछा ढाल।
Source: Poetry (May 2026)


