दिन किशमिशी-रेशमी, गोरा

दिन
किशमिशी रेशमी गोरा
               मुसकराता
आब
मोतियों की छिपाए अपनी
               पाँखड़ियों तले

सुर्मयी गहराइयाँ
               भाव में स्थिर
जागते हों स्वप्न जैसे
माँगते हों कुछ...
          खिलौना जागता-सा
                              मौन कोई
क्या वही तो तू नहीं है मन?

____

गोद यह
रेशमीगोरी, अस्थिर
अस्थिर
          हो उठती
                    आज
किसके लिए?

____

   जा
ओ बहार
   जा!
मैं जा चुका कब का
   तू भी...
ये सपने न दिखा!

जाविदानी है अगर्चे तू
जाविदानी है अगर्चे जिन्दगी
      फिर भी
रह म कर!

Source: Poetry (May 2026)