एक आदमी दो पहाड़ों को कोहनियों

1956

एक आदमी दो पहाड़ों को कोहनियों से ठेलता
पूरब से पच्छिम को एक कदम से नापता
बढ़ रहा है

कितनी ऊंची घासें चांद-तारों को छूने-छूने को हैं
जिनसे घुटनों को निकालता वह बढ़ रहा है
अपनी शाम को सुबह से मिलाता हुआ

फिर क्यों
              दो बादलों के तार
उसे महज उलझा रहे हैं?

Source: Poetry (May 2026)